तुर्रा अखाड़ा के उस्ताद की पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धासुमन

तुर्रा अखाड़ा के उस्ताद की पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धासुमन

चित्तौडग़ढ़ (विवेक वैश्णव)। राजस्थानी कला विधा तुर्रा के उस्ताद चैनराम गौड़ एक अद्वितीय विभूति थे। उन्होंने एक आशु कवि के रूप में भी अपनी पहचान स्थापित की थी। उनका शब्द भण्डार इतना दृढ, सशक्त और विस्तृत था कि उनकी काव्य रचना सुनकर श्रोता भी इसे एक ईश्वरीय देन कहते थे।

चैनराम गौड़ ने उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की थी लेकिन उनके ज्ञानानुभव से ऐसा प्रतीत होता था कि शिक्षा क्षेत्र में किसी से कम नहीं है। इनका घर आज भी तुर्रा का अखाड़ा के नाम से विख्यात है। इन्होंने कई खेलों (अभिनय) की रचनाएं की थी जिनमें रूकमणी मंगल, रूप बसंत, निहाल दे सुल्तान, विक्रम चोबोली, सीता हरण, सीता स्वयंवर, तेजाजी महाराज प्रमुख रहे है। इन्होंने इन खेलों में अपनी काव्य रचनाओं से विभिन्न राग रागनियों को सम्मिलित कर बड़े ही मनोरंजनात्मक ढंग से कई मंचों पर अभिनीत करवायें है। आज भी इनका साहित्य एक विरासत (थाती) के रूप में सुरक्षित है।

1959 के जुलाई अगस्त माह में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद चित्तौडग़ढ़ दौरे पर थे। तब गाडिया लौहार स्कूल स्थित सभागार में आयोजित स्वागत समारोह में आषु कवि चैनराम गौड़ की भावमयी स्वागत कविता से राष्ट्रपति महोदय भी आत्म विभोर हो गये थे। आज भी उनके भजनों, गीतों की गूंज मेवाड़ अंचल में गुंजायमान है। उनके काव्य में मनोरंजन, शिक्षा, उपदेश, नीति आदि बिन्दु तो समाहित होते ही थे साथ ही साम्प्रदायिक सद्भाव से भी परिपूर्ण रहते थे। वे अपने काव्य संग्रह में हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाशाओं का प्रयोग करते थे।

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