शहीद की मूर्ति अनावरण का कर रही इंतजार, वृद्धा मां बैठ गई थक हार,

शहीद की मूर्ति अनावरण का कर रही इंतजार, वृद्धा मां बैठ गई थक हार,

-तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने तय किया कार्यक्रम कराया था रद्द, तब से अब तक प्लास्टिक की पन्नी में बंद पड़ी है शहीद की मूर्ति

-एक सामान्य से पत्र का जवाब देने वाला प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस मसले पर न तो जवाब दे सका और न ही संबंधित विभाग को इस मसले पर कार्रवाई के निर्देश दे सका

रोशनलाल शर्मा

देश के जवानों के सम्मान में बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो कर दी जाती है लेकिन शहीद के पीछे उनके परिवार से जुड़ी संवेदनाओं की किस कदर हत्या प्रशासनिक तंत्र करता है, इसकी एक बानगी आपको इस खबर के जरिए पता चलेगा। देश, राष्ट्र की बात करने वाली सरकारें हों या फिर जिला प्रशासन उनके लिए संभवत: जवानों का शहीद होना एक रूटीन होगा लेकिन जिस मां का बेटा, जिस बहन का भाई हमेशा के लिए देश के लिए काम आ जाता है, उनपर उस समय क्या गुजरती होगी जब उस शहीद के सम्मान में एक मूर्ति का अनावरण कराने में भी परिवार की जूतियां घिस जाए।

अब आप कहानी सुनिए सीकर के नीमका थाना के मावंडा खुर्द के रहने वाले मुकेश कुमार शर्मा की। वह अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर 2006 में छत्तीसगढ़ आम्र्ड फोर्स की 12वीं बटालियन में भर्ती हुआ। 29 दिसम्बर 2013 को तीस साल का ये जवान रामानुगंज छत्तीसगढ़ में नक्सिलयों से लड़ते हुए शहीद हो गया। वृद्धा मां के हाथों के तोते उड़ गए क्योंकि दो माह पूर्व ही उसका सुहाग और मुकेश कुमार शर्मा के पिता का निधन हो गया था। दो माह में ही दो वज्रपात के बाद मां तो टूट सी गई लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी असली परीक्षा तो अब शुरू होगी। इसके बाद शहीद के सम्मान के लिए शहीद की मूर्ति लगाने की प्रक्रिया मां ने शुरू की और मां का साथ देने के लिए आगे आई बहन ममता। दोनों ने मूर्ति की स्थापना के लिए जिला कलेक्टर से जमीन आवंटन के लिए गुहार लगाई। चार साल एडिय़ां घिसने के बाद वर्ष 2018 में शहीद के लिए जगह आवंटित हो गई। वृद्ध मां ने शहीद की शहादत के बाद मिले रुपयों में से करीब दस लाख रुपए खर्च करके उस जमीन की बाउण्ड्री कराई, उसमें छतरी बनवाई और शहीद बेटे की मूर्ति भी बनवाई। इसके बाद तत्कालीन सैनिक कल्याण मंत्री प्रेमसिंह बाजौर से सम्पर्क करके अनावरण के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को बुलाने की गुहार लगाई। उस समय पर राजे अपनी सुराज संकल्प यात्रा पर चल दीं। तय हुआ कि राजे 22 सितम्बर 2018 को अपनी यात्रा के दौरान शहीद मुकेश की मूर्ति का अनावरण करेंगी। तैयारियां पूरी हो गई। अधिकारी मौके पर पहुंच गए। 22 सितम्बर का दिन भी आ गया। लेकिन संभवत: किन्हीं राजनीतिक कारणों के चलते राजे उस दिन शहीद के मूर्ति स्थल के महज सौ पचास मीटर दूरी से ही निकल गईं और मूर्ति का अनावरण नहीं किया। इस दिन मुख्यमंत्री ने वहीं पर भाजपा कार्यकर्ताओं और विधायकों से संवाद भी किया। दूसरे दिन शहीद के परिवार को अखबारों से पता चलता है कि मुख्यमंत्री मूर्ति का अनावरण नहीं करेंगी।

कफन सी महसूस होती है वह पॉलिथिन

उसके बाद से ही शहीद मुकेश कुमार शर्मा की मूर्ति एक पॉलिथिन में अपने अनावरण का इंतजार कर रही है। शहीद की बहन ममता का कहना है कि वह पॉलिथिन हमारे परिवार का मुंह चिढ़ाती है। पॉलिथिन की ये थैली एक कफन सी महसूस होती है। इस मूर्ति के अनावरण के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक पत्रव्यवहार किया जा चुका है लेकिन आपको ताज्जुब होगा कि एक सामान्य से पत्र का जवाब देने वाला प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस मसले पर न तो जवाब दे सका और न ही संबंधित विभाग को इस मसले पर कार्रवाई के निर्देश दे सका।

मां अब असहाय, भाई फौज में

अब तो परिवार में कोई भागदौड़ करने वाला भी नहीं है। मां की उम्र 75 वर्ष हो गई है। उसने सुनना भी बंद कर दिया है। एक भाई वहीं छत्तीसगढ़ में तिब्बत सीमा पुलिस बल में तैनात है और देश की रक्षा में जुटा है। उसके पास भी समय नहीं है कि वह अपने शहीद बड़े भाई को सम्मान दिलाने के लिए यहां राजस्थान में लड़ाई लड़ सके। एक दूसरा भाई भी छत्तीसगढ़ में ही प्राइवेट नौकरी कर रहा है।

अब संवदेनशील मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से आशा

इस मसले पर शहीद मुकेश कुमार शर्मा की बहन ममता का कहना है कि उनको अब राज्य के संवेनदशील मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से आशा है। ममता ने कहा कि वे मुख्मयंत्री से गुहार करती हैं कि वे अपना समय निकाले और मेरे भाई की शहादत का सम्मान देने के लिए उसकी मूर्ति का अनावरण करे। ताकि फौज में जाकर देश सेवा करने वालों का जज्बा टूटे नहीं।

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